चारधाम यात्रा – सड़क चौडीकरण के लिए काटे गए पेड़ और मार्गों पर जमा मलबा सड़क हादसों की बड़ी वजह

 

उत्तराखंड में चारधाम यात्रा शुरू हो गई है। दो साल से कोरोना प्रतिबंध के कारण भीड़ का सैलाब रूका हुआ था लेकिन इस बार चारधाम यात्रा शुरू होते ही लाखों की भीड़ यात्रा मार्गों पर उमड़ पड़ी है। इस बढ़ती भीड़ ने सड़क हादसों की चिंताएँ भी बढ़ा दी है। इसकी एक बड़ी वजह चारधाम यात्रा को देखते हुए बनाई गई ऑल वेदर रोड की चौड़ी और सपाट सड़कें तो हैं ही, लेकिन सड़क चौड़ीकरण के लिए काटे गए पेड़ और लगातार होते भूस्खलन से मार्गों पर जमा मलबा भी एक बड़ा कारण है।

3 मई यमनोत्री के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा शुरू हो गई है, और कोरोना प्रतिबंध के कारण विगत दो वर्षों मे यात्रा बंद रहने के कारण इस वर्ष आने वाले यात्रियों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। 1 मई तक करीब  2,50,000 लोग रजिस्ट्रेशन करा चुके थे और हवाई यात्रा की बात करें तो रिपोर्टस के अनुसार जून तक की सभी सीट्स बुक हो चुकी है। निःसन्देह इसमे चौड़ी सड़कों और यातायात के सुगम साधनों की भी अहम भूमिका है।

उत्तराखंड मे  ऑलवेदर रोड परियोजना के कारण सड़कों के निर्माण मे आई तेजी की वजह से अब चारधाम यात्रा पिछले दशकों के मुक़ाबले काफी सुगम हो गई है। परंतु सड़कों के चौडीकरण के लिए की गई पहाड़ों व  पेड़ो की अंधाधुंद कटाई और विस्फोटों के कारण कई स्थानों पर चट्टानों मे गहरी दरारे आ गई है। जिससे वंहा मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत्रों के मार्ग या तो नष्ट हो गए या फिर अवरूद्ध हो गये हैं, और यात्रा के शुरु होने के साथ ही अब इन स्रोतों से दरारों मे होने वाला जल रिसाव भूस्खलन का एक नया खतरा बन रहा है।

मीडिया रेपोर्ट्स की माने तो उत्तराखंड मे ऑलवेदर रोड परियोजना के कारण अब तक करीब 56000 पेड़ काटे गए है। पेड़ो के कटने से मिट्टी की पकड़ और प्राकृतिक पानी के स्रोतों के रास्ते भी टूट जाते है। ऐसे मे इन स्रोतों का पानी विस्फोटो से बनी दरारों मे समाने लगता है।

दैनिक भास्कर मे छपी खबर की माने तो इन अवरूद्ध जल स्त्रोतों का पानी एक जगह इकट्ठा होकर आस पास की चट्टानों मे रिस कर उन्हे गीला कर रहा है। जिससे ये मिट्टी की चट्टानें कभी भी ढह सकती हैं। साथ ही ओवर हेंगिग वाली कई जगहों पर चट्टानों मे दरारें आ गई हैं। जिससे इनके गिरने का खतरा और भी बढ़ गया है ।

खबर के अनुसार उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के डाइरेक्टर और  वरिष्ठ भूगर्भीय वैज्ञानिक प्रो0 एमपीएस बिष्ट ने बताया कि कुछ समय पहले ऐसे डेंजर जोन चिन्हित किए गये थे जहां पर चट्टनों के गिरने कि सबसे ज्यादा संभावना है। यात्रा शुरू होने से पहले इन चट्टानों को ढहा दिया जाना चाहिए था।

प्रो0 बिष्ट के अनुसार इस तरह कि चट्टानें ऋषिकेश – बद्रीनाथ मार्ग पर तोतघाटी, पाताल गंगा, विष्णु प्रयाग, लामबगड़ और हनुमान चट्टी मे आसानी से देखी जा सकती हैं। थोड़ी सी उथल पुथल से ये बड़ी और गीली चट्टानें कब गिर जाए कहा नहीं जा सकता। यात्रा सीजन मे कुछ ऐसे  तीव्र ढलानों, दरारों और साल भर पानी निकलने से गीली हुई चट्टानों वाली जगहों पर ढाबे खोल दिये गये  है, जहाँ यात्रियो का जमघट लगा रहता है। अब अगर ऐसे मे ये चट्टानें गिरती हैं तो  इससे होने वाली जनहानि का अनुमान लगाया जा सकता है।

सड़कों के चौड़े और सपाट होने से पहाड़ो मे आने वाले वाहनों की स्पीड भी बढ़ रही है परंतु सर्पीले और अंधे पहाड़ी मोड़ो पर चालक का नियंत्रण कम हो ही जाता है ऐसे मे ऑल वेदर रोड़ परियोजना के कारण सड़कों पर बिखरा मलबा सड़क हादसों की बहुत बड़ी वजह बन गया है।

इसके अलावा भी हिमालय मे होने के कारण उत्तराखंड मे रोज ही कम तीव्रता वाले भूकंप आते रहते हैं, जो महसूस तो नहीं होते पर बड़ी प्राकर्तिक उथल-पुथल कि भूमिका बनाते रहते हैं । ऐसे मे सड़को के विकास मे हुई गलतियों को अनदेखा करना किसी बड़ी त्रासदी को आमंत्रित करना ही है।

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