एशिया के सबसे बडे लिक्विड मिरर टेलिस्कोप को नैनीताल के देवस्थल मे किया गया स्थापित

उत्तराखंड के आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज(ARIES), नैनीताल के देवस्थल मे भारत का पहला और एशिया की सबसे बड़ी लिक्विड मिरर टेलिस्कोप को स्थापित किया गया है। कनाडा और बेल्जियम के सहयोग से बने इस टेलिस्कोप से अन्तरिक्ष मे होने वाली गतिविधियों को देखा जा सकेगा। एशिया मे पहले लगी तरल दूरबीन का व्यास 3.6 मीटर था जबकि देवस्थल मे लगी इस दूरबीन का व्यास 4 मीटर है। जिससे यह भारत की पहली, दुनिया का तीसरी और एशिया की सबसे बड़ी टेलिस्कोप बन गई है। बताते चलें कि इस कार्ययोजना का उदघाटन प्रधानमंत्री मोदी और बेल्जियम मे उनके समकक्ष चार्ल्स मिशेल ने 2016 मे किया था।कोरोना के कारण इसके स्थापना मे देरी हो गई थी।  इसकी कुल लागत राशि 50 करोड़ है।

क्या है लिक्विड टेलिस्कोप

लिक्विड मिरर टेलिस्कोप (तरल-दर्पण दूरबीन) एक परावर्तक तरल (reflecting liquid) से बनी दर्पणों (mirror) वाली दूरबीन  होती हैं। इसमे अधिकतर तरल पारे (liquid murcury) का उपयोग किया जाता है। इसमे लिक्विड और उसके कंटेनर को एक ऊर्ध्वाधर अक्ष (vartical axis) के चारों ओर एक निश्चित गति से घुमाया जाता है, जिससे तरल की सतह एक परवलयिक (parobolic) आकार ले लेती है और फिर यही पैराबोलिक रिफलेक्टर दूरबीन के पहले दर्पण के रूप में काम करता है। लिक्विड मिरर मे पारंपरिक बड़े दूरबीनों, जिनमे ठोस कांच के दर्पण को कास्ट, ग्राउंड और पॉलिश के साथ उपयोग किया जाता है, के स्थान पर एक सस्ते विकल्प  के रूप मे उपयोग किया जाता है।  यह दूरबीन केवल उन वस्तुओं को अंतरिक्ष में देख सकती है, जो इसके दृश्य (focus) में आती हैं, क्योंकि इसे अलग-अलग दिशाओं में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।

क्या है खास

नैनीताल की ऑबशर्वेटरी में लगाई गई इस दूरबीन समुद्र तल से 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित की गई है इस दूरबीन की सहायता से अब आकाशगंगा मे होने वाली गतिविधियों जैसे अंतरिक्ष में खगोलीय टुकड़ों, क्षुद्र तारों, सुपरनोवा और गुरुत्वीय लेंस आदि के बारे मे जानकारी को एकत्र किया जा सकेगा। साथ ही आने वाले समय मे अन्तरिक्ष के क्षेत्र मे कार्य करने वाले वैज्ञानिकों और शोधार्थियों को बहुत मदद मिलेगी।

 

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