मणिपुर सरकार ने SC में दाखिल की हथियारों की बारामदगी से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट

पीटीआई। मणिपुर की एन बीरेन सिंह सरकार ने हथियारों की बारामदगी से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ को शुक्रवार को यह जानकारी दी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ को बताया कि विभिन्न स्त्रोतों से हथियारों की बारामदगी को लेकर स्टेटस रिपोर्ट मणिपुर सरकार ने शीर्ष अदालत में दाखिल कर दी है। उन्होंने पीठ को मामले में एक और संक्षिप्त हलफनामे के बारे में जानकारी दी।

 तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि हलफनामे में कहा गया है कि यहां जिन भी मुद्दों पर बहस हो रही है, उन्हें पहले ही शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त समिति के संज्ञान में लाया जा चुका है। पैनल उस पर विचार भी कर रहा है। शीर्ष अदालत ने छह सितंबर को मणिपुर सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से राज्य में ‘सभी स्रोतों’ से हथियारों की बरामदगी पर एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। अदालत का यह निर्देश पुलिस स्टेशनों से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद चोरी होने के मामले सामने आने के बाद आया। शीर्ष अदालत ने राज्य में जातीय हिंसा के पीड़ितों के राहत और पुनर्वास की निगरानी के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गीता मित्तल की अध्यक्षता में एक न्यायाधीश समिति नियुक्त की थी।
 
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने पीठ को बताया कि मणिपुर में मई में सामूहिक दुष्कर्म और हत्या की शिकार दो महिलाओं के शव अभी तक उनके परिवारों को नहीं सौपे गए हैं। शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त समिति पहले ही इसका संज्ञान ले चुकी है और अधिकारियों को निर्देश जारी कर चुकी है। पीठ ने मामले की सुनवाई 25 सितंबर को तय की। पीठ ने केंद्रीय गृह सचिव को पैनल के कामकाज में मदद के लिए विशेषज्ञों के नामों को अंतिम रूप देने के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मित्तल के साथ संवाद करने का निर्देश दिया था। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मित्तल की अध्यक्षता वाले पैनल में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) शालिनी पी जोशी और आशा मेनन भी शामिल हैं।

मई में भड़की हिंसा

मणिपुर में हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद हिंसा भड़क उठी। इस आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मैतेई समुदायक को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने पर विचार करने का निर्देश दिया था। तीन मई को पहली बार हिंसा भड़की, जिसके बाद से अबतक 160 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हो गए। हिंसा ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के दौरान भड़की थी।

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