विदेशी एनजीओ कर रहे हैं भारत से पारदर्शिता बरतने की मांग

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कई अंतरराष्ट्रीय एनजीओ भारत में गैरसरकारी संगठनों के नियामन की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की मांग कर रहे हैं. बीते सालों में कुछ बड़े चैरिटी संस्थान देश से बाहर निकलने को मजबूर हुए हैं. आखिर कहां है समस्या?

अमेरिकी एनजीओ कम्पैशन इंटरनेशनल को मार्च में जब अचानक भारत में अपनी सभी गतिविधियां बंद करनी पड़ीं, तो विदेशी फंडिंग से चलने वाले देश के सभी चैरिटी संस्थानों में घबराहट सी फैल गयी. विदेशी एनजीओ पर बीते कुछ सालों में भारत में शिकंजा कसता सा दिखा है. कम्पैशन इंटरनेशनल का कहना था कि उन्हें कुछ सालों से भारत में “बड़ी चुनौतियों” का सामना करना पड़ रहा था. सवाल यह है कि अचानक ऐसा क्या बदल गया है.

अमेरिका खुद को विश्व भर में नागरिक संगठनों को मजबूत बनाने और नागरिकों को सेहतमंद बनाने का “कट्टर समर्थन” बताता है. हाल ही में कोलोराडो की ईसाई चैरिटी संस्था कम्पैशन इंटरनेशनल को भारत में करीब पचास साल से जारी अपने ऑपरेशन बंद करने पड़े. भारत में प्रशासन को संदेह था कि अमेरिका से आने वाले इस धन का इस्तेमाल हिंदू बहुल देश में लोगों का धर्मांतरण करवाया जाता है या इनका इस्तेमाल ‘एंटी नेशनल’ गतिविधियों में होता है.

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद से ऐसे कई विदेशी एनजीओ की फंडिंग में समस्याएं आयी हैं. 2014 से भारत में 10,000 से भी अधिक चैरिटी संस्थाओं के विदेशी फंड स्वीकार करने के लाइसेंस रद्द या स्थगित कर दिये गए हैं.

चैरिटी संस्थाएं कहती हैं कि इस तरह की कड़ाई का मकसद किसी भी तरह की असहमति को दबाने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों और आजादी को छीनना है. भारत में 1968 में स्थापित हुई यह संस्था सालाना करीब 4.5 करोड़ डॉलर की फंडिग पा रही थी, जिससे करीब छह सौ चैरिटीज के नेटवर्क को धन मिलता था. इनके माध्यम से 147,000 गरीब बच्चों को मदद मिल रही थी.

पर्यावरण के मुद्दों पर काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ग्रीनपीस, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिये काम करने वाले लॉयर्स कलेक्टिव और मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं मोदी की आलोचक मानी जाने वाली तीस्ता शीतलवाड़ के सबरंग ट्रस्ट – इन सब के लाइसेंस एफसीआरए के अंतर्गत स्थगित कर दिये गये. जिसकी देश-विदेश हर जगह आलोचना हुयी.

अमेरिका के स्टेट विभाग के प्रवक्ता मार्क टोनर ने कहा है, “एनजीओ बाहर के देशों में कई महत्वपूर्ण काम करते हैं. यह सही है कि इन देशों और सरकारों के पास अपने कानून पास करने के लिए कई वजहें होती होंगी. लेकिन हमें लगता है कि उन्हें ज्यादा पारदर्शी होने और स्पष्ट होने की जरूरत है कि वे इन संगठनों को बंद क्यों करवा रहे हैं.”

भारत में अपना कामकाज जारी रखने में समस्या का सामना कर रहे विदेशी एनजीओ पर आरोप लगते हैं कि कई बार वे भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करते या फिर विदेशी एजेंडा भारत में लागू करने की कोशिश करते हैं. अमेरिकी एनजीओ को बंद किए जाने, उनके खाते फ्रीज किए जाने जैसे कदमों की शिकायत अमेरिका ने भारत के साथ डिप्लोमैटिक स्तर पर उठायी है.

दिसंबर 2016 में भारत के गृह मंत्रालय ने कह दिया था कि वे अमेरिका स्थित दाताओं के भारतीय एनजीओ को फंडिंग करने पर रोक के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेंगे. कुछ अमेरिकी एनजीओ को मई में ‘पूर्व अनुमति श्रेणी’ में डाल दिया गया था. इस श्रेणी में डाले गये दाता संगठन, बिना सरकार की आज्ञा लिये बिना भारत के किसी एनजीओ को फंड नहीं भेज सकते. देखना होगा कि आने वाले समय में दोनों पक्ष क्या एक दूसरे का भरोसा वापस जीत पाएंगे.

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