पड़ोसियों से ज्यादा दुखी हैं हम

0
64

हमारे देश में अक्सर जब हम किसी से मिलते हैं तो हमारा पहला सवाल होता है कैसे हैं आप? और अक्सर जवाब मिलता है सब बढ़िय़ा है.! इसका मतलब ये है कि जिससे हम सवाल पूछ रहे हैं उसकी स्थिति ठीक है और वो जीवन का आनंद ले रहा है. लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सबसे ज्यादा बोला जाने वाला ये वाक्य आज का सबसे बड़ा झूठ है. जब भारत के लोग ये कहते हैं कि वो अच्छे हैं और सब कुछ बढिया चल रहा है, तो आप समझ जाइये कि इनमें से ज्यादातर लोग झूठ बोल रहे हैं. क्योंकि आंकड़ों के मुताबिक भारत के लोग दुनिया के सबसे ज्यादा दुखी लोगों में से एक हैं.

पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी World Happiness Index में भारत की रैंकिंग गिरी है. ये दुख की बात है कि हर साल भारत के लोग और ज्यादा दुखी और उदास होते जा रहे हैं. जबकि भारत आर्थिक तरक्की के नए नए Records बना रहा है. United Nations ने जब इस वर्ष के World Happiness Index को तैयार किया तो उसमें भारत को 122वां स्थान मिला. हैरानी की और अफसोस की बात ये है कि भारत खुशियों के मामले में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों से भी पीछे हैं. यानी ये देश भारत के मुकाबले ज्यादा खुश हैं.

इस Index में भारत की रैंकिंग पिछले 4 वर्षों में लगातार गिरी है. 2013 में भारत 111वें नंबर पर था, 2014 में ये रिपोर्ट नहीं आई थी, वर्ष 2015 में भारत को 117वां स्थान मिला था और वर्ष 2016 में भारत 118वें नंबर पर था. लेकिन इस बार भारत की Ranking कुछ ज्यादा ही गिर गई है, और भारत 122वें नंबर पर पहुंच गया है. इसमें चीन की रैंक 79, पाकिस्तान की 80, नेपाल की 99 और बांग्लादेश की रैंक 110 है. यहां तक कि श्रीलंका की रैंक भी 120 है.

लेकिन आपको जानकर दुख होगा कि सिर्फ श्रीलंका और बांग्लादेश को छोड़कर भारत के बाकी पड़ोसी देशों की रैंकिंग बेहतर हुई है. पिछले वर्ष चीन की रैंक 83 थी, पाकिस्तान 92 नंबर पर और नेपाल 107वें नंबर पर था. आपको अच्छा लगे या बुरा लेकिन सच ये है कि पाकिस्तान के लोग भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा खुश हैं, इस Index पाकिस्तान की रैंक 12 अंक बेहतर हुई है.

दुनिया का सबसे खुश देश Norway है जबकि Denmark दूसरे और Iceland तीसरे नंबर पर है. कुल मिलाकर ध्यान देने वाली बात ये है कि भारतीय लोग मुस्कुराने और खुश रहने के मामले में बेहद पीछे हैं. United Nations की इस रिपोर्ट में 155 देशों को शामिल किया गया है. इस रिपोर्ट को तैयार करने में GDP, स्वस्थ जीवन की संभावना, सामाजिक समर्थन, विश्वास, फैसले लेने की आज़ादी और उदारता यानी दान देने की प्रवृत्ति को पैमाना बनाया गया है.

अब ये सोचने वाली बात है कि भारत के लोगों की खुशियां कहां गायब हो रही है. तो हम आपको बता दें कि भारत के लोगों के क्रोध और ईर्ष्या की भावना इसके लिए ज़िम्मेदार है. हमारे देश में लोग अपने जीवन की खुशियों पर फोकस करने के बजाए दूसरों के सुख से दुखी होते रहते हैं. यानी लोगों को अपनी असलफता का दुख कम होता है और दूसरे की सफलता का दुख ज़्यादा होता है.

1978 में फिल्मकार मुज़फ्फर अली की एक फिल्म आई थी जिसका नाम था गमन. और इस फिल्म में मशहूर शायर, शहरयार का लिखा एक गीत था.. जिसके बोल थे. सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है. इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है. आज हम भले ही 2017 में हैं. लेकिन 1978 का ये गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है.

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY