आधुनिक भारत के सबसे बड़े रहस्य का विश्लेषण

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DNA में आज सबसे पहले हम आधुनिक भारत के सबसे बड़े रहस्य का विश्लेषण करेंगे। ये रहस्य क़रीब 23 वर्ष पुराना है, जिसका रिश्ता ISRO यानी Indian Space Research Organisation से जुड़ा हुआ है। आपने पिछले कुछ वर्षों में ISRO की क़ामयाबी से जुड़ी कई बड़ी ख़बरें देखी और सुनी होंगी। अभी कुछ दिनों पहले ही, ISRO ने 104 Satellites को एक साथ अंतरिक्ष में भेजकर, World Record बनाया था और दुनिया को भारत की अंतरिक्ष वाली शक्ति पर चर्चा करने के लिए मजबूर कर दिया था। लेकिन अगर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के खिलाफ साज़िश ना हुई होती तो भारत को ऐसी कामयाबी कई वर्ष पहले ही मिल सकती थी।

आज से क़रीब 23 वर्ष पहले, 1994 में एक ऐसा मामला सामने आया था, जिसने ISRO और उसके वैज्ञानिकों की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। ये मामला था, ISRO में हुए जासूसी कांड का। जिसमें Cryogenic Engine के विकास से जुड़े कुछ वरिष्ठ वैज्ञानिकों पर देश के खिलाफ जासूसी करने के आरोप लगाए गये थे। बाद में CBI और फिर अदालत ने इन आरोपों को फर्जी बताया था और सभी वैज्ञानिकों को बाइज़्ज़त आरोप मुक्त कर दिया गया था।
लेकिन, जिन पुलिस अधिकारियों ने भारत के वैज्ञानिकों के खिलाफ साज़िश की थी और उन्हें फर्ज़ी जासूसी केस में गिरफ़्तार किया था, उन पुलिसवालों पर अब कार्रवाई हो सकती है। कल सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का फैसला आ सकता है। इसलिए आज इस ख़बर का विश्लेषण करना ज़रुरी है।

इस विश्लेषण से आपको ये पता चलेगा कि कैसे देश के दुश्मनों ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाया था और कैसे उसी नुकसान की वजह से भारत को अंतरिक्ष की दुनिया में, बड़ी कामयाबियां हासिल करने के लिए, लंबा इंतज़ार करना पड़ा। सबसे पहले आपको ये समझना होगा, कि ये पूरा मामला क्या है और इसमें अब तक क्या-क्या हुआ है?

वर्ष 1991 में ISRO ने, Russia के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। जिसके तहत Russia, भारत को Cryogenic-Based Fuels Develop करने की तकनीक Transfer करने के लिए राज़ी हो गया था। इसके लिए Russia ने भारत के साथ सिर्फ 235 करोड़ रुपये की Deal की थी। जबकि इसी तकनीक के लिए अमेरिका ने भारत से 950 करोड़ रुपये और फ्रांस ने 650 करोड़ रुपये मांगे थे। Russia के साथ समझौता करके, भारत ने फ्रांस और अमेरिका को नाराज़ कर दिया। लेकिन इसके बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति George W. Bush के दबाव में आकर, Russia ने भारत को Cryogenic-Based Fuels Develop करने की तकनीक Transfer करने से इंकार कर दिया।

यहां आपको ये समझाना भी ज़रुरी है, कि Cryogenic-Based Fuels की तकनीक क्या होती है?
Cryogenic Engine शून्य से बहुत नीचे के तापमान पर काम करते हैं। माइनस 238 डिग्री Farenheit को Cryogenic तापमान कहा जाता है। इस तापमान पर Cryogenic Engine का ईंधन, यानी ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैसें Liquid बन जाती हैं। Liquid Oxygen और Liquid Hydrogen को Cryogenic Engine में जलाया जाता है। जब Liquid ईंधन जलता है, तो उससे इतनी ऊर्जा पैदा होती है, जिससे Cryogenic Engine को 4.4 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार मिल पाती है।

लेकिन Russia ने जब ये तकनीक भारत को देने से इंकार कर दिया, तो भारत के पास सिर्फ एक Option था, कि वो खुद Cryogenic Engine को Develop करे। तब ISRO ने स्वदेशी Cryogenic Engine के विकास का फैसला किया था और इसके लिए एक Project की शुरूआत की गई थी। S Nambi Narayanan नाम के वैज्ञानिक को इस Project का Director बनाया गया। Narayanan वही वैज्ञानिक थे, जिन्होंने पहली बार भारत में Liquid Fuel Technology का विकास किया था। ISRO के PSLV यानी Polar Satellite Launch Vehicle में इसी तकनीक पर आधारित इंजन का इस्तेमाल किया जाता है। उस समय Narayanan, Second Stage PSLV और Fourth Stage PSLV के Project Director भी थे। लेकिन, वर्ष 1994 में S Nambi Narayanan और उनके साथियों को केरल पुलिस ने, कथित जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि 20 अक्टूबर 1994 को केरल पुलिस ने, मालदीव की एक महिला को गिरफ़्तार किया था, जिसपर आरोप था, कि वो अपना VISA, Expire होने के बावजूद भारत में रह रही थी। लेकिन अगले ही महीने केरल पुलिस ने ISRO के दो वैज्ञानिकों, S Nambi Narayanan और D शशिकुमार को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने दावा किया, कि ISRO में Cryogenic Engine Project के प्रमुख, Nambi Narayanan और उनके सहयोगी शशिकुमार ने, उस महिला को Project से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेज सौंपे थे। पुलिस का ये भी कहना था, कि ये दोनों ISRO में जासूसी करके Engine के विकास से जुड़ी जानकारी इकट्ठा कर रहे थे, ताकि वो विदेशी Agents को सौंपी जा सके। जिसके बाद Narayanan को 50 दिनों तक जेल की सज़ा काटनी पड़ी। Interrogation के दौरान उन्हें Torture भी किया गया। बाद में इस मामले को केंद्रीय जांच एजेंसी CBI को सौंप दिया गया।

हालांकि, वर्ष 1996 में CBI ने इस मामले में Closure Report दाखिल कर दी। इसमें पूरी जांच और अधिकारियों की मंशा पर कई गंभीर सवाल खड़े किए गए। Nambi Narayanan को Clean Chit देते हुए CBI ने ये भी सिफारिश की थी, कि जिन अधिकारियों ने इस केस को ग़लत तरीके से पेश किया, उनके ख़िलाफ कार्रवाई की जाए। वर्ष 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने भी CBI के निष्कर्ष को बरकरार रखते हुए, Nambi Narayanan के पक्ष में फैसला सुनाया।

इंसाफ की इस लड़ाई की अंतिम कड़ी अभी बाकी है। वर्ष 1996 में CBI की सिफारिश के बावजूद आज तक दोषी अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। केरल में कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। और अब वैज्ञानिक नांबी नारायणन इन्हीं पुलिस अधिकारियों को न्याय के कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं।

ISRO में जासूसी का ये मामला बिल्कुल फिल्मी कहानी की तरह है। एक ऐसी कहानी जिसमें Villain कौन है, किसी को नहीं पता लेकिन इसके पीड़ित हमारे देश के वैज्ञानिक हैं। ISRO में जासूसी का ये फर्ज़ी मामला, देश के लिए किसी झटके से कम नहीं था। क्योंकि उस वक्त Cryogenic Engine का विकास ISRO की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना थी।

ISRO जासूसी कांड का एक दूसरा पक्ष भी है, जो इस पूरे प्रकरण को और भी ज़्यादा रहस्यमय बनाता है। क्योंकि, इस पूरे कांड के बाद लगातार ये सवाल उठता रहा, कि अगर किसी वैज्ञानिक ने जासूसी नहीं की थी, तो उन्हें फर्जी केस में क्यों फंसाया गया? क्या इसका मकसद ISRO की Cryogenic Engine के विकास की परियोजना को असफल करना था?

इस सवाल के जवाब में एक धारणा काफी प्रचलित है। इस धारणा के मुताबिक इस जासूसी कांड के पीछे अमेरिका की Intelligence Agency, CIA का हाथ था। ऐसा माना जाता है, कि अमेरिका पहले से ही इस बात के विरोध में था, कि भारत Cryogenic Engine का विकास करे। क्योंकि, ऐसा होते ही भारत, ज़्यादा वज़न वाले Satellites Launch करने के  कारोबार में अमेरिका और फ्रांस का Competitor बन जाता।

ISRO जासूसी मामले पर कई किताबें भी लिखी गई हैं। जिनमें सबसे प्रमुख किताब पत्रकार Brian Harvey की है। जिसका नाम है, Russia in Space: The Failed Frontier? इस किताब में कई दस्तावेजों के आधार पर ये दावा किया गया है, कि CIA ने ISRO के Cryogenic Engine विकास कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाया था।

अगर 90 के दशक में Cryogenic Engine बनाने में भारत ने क़ामयाबी हासिल कर ली होती, तो अंतरिक्ष की दुनिया में आज भारत सुपरपावर बन चुका होता। ये देश के हित से जुड़ा एक बहुत बड़ा मामला है और इस मामले में ज़ी न्यूज़ उन वैज्ञानिकों के साथ है, जो भारत को अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना चाहते हैं।

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